खुली आंख से देखिए, अपना होगा हर सपना / नीरज दइया

मधु आचार्य ‘आशावादी’ का नाम हिंदी-राजस्थानी में सुपरिचित नाम है और हर्ष का विषय है कि आपने बाल साहित्य के अंतर्गत बाल-उपन्यास अपना होता सपनादेकर बाल साहित्य सृजन का भी आरंभ किया है। अनेक बालसाहित्यकारों की भांति स्वयं मधु आचार्य का मानना है कि बाल-साहित्य सृजन चुनौतियों से भरा है। किंतु यह चुनौती आज की आवश्यकता है। बाल मनोविज्ञान की सूक्ष्म पकड़ के साथ बलकों में कुछ कर गुजने का हौसला देती कथा है बाल-उपन्यास ‘अपना होता सपना’ में।
      इसे उपन्यास नायक नितिन की एक संघर्षभरी किंतु सोचक व प्रेरक जीवनी भी कहा जा सकता है। इसमें कर्मशील नितिन का चरित्र बाल-पाठकों के समक्ष एक आदर्श के रूप में चित्रित किया गया है। शीर्षक में कौतूहल है कि सपना क्या और कौनसा है? सपना अपना कैसे होता है? रूढ़ अर्थों में सपना तो सच्चा या झूठ होता है। सपने को हम अपना और पराया भी कहते हैं। उपन्यास प्रेरणा देता है कि खुली आंखों से देखा गया सपना ही असल सपना होता है। उपन्यस के कथा-नायक नितिन ने भी कुछ ऐसा ही सपना खुली आंखों से देखा, जिसे सरल-सहज प्रवाहमयी भाषा में लेखक ने बाल-मन और मनोविज्ञान के ध्यान में रखते हुए रचा। इसे ऐसे भी कहा जा सकता है कि यह उपन्यास बालमन के समक्ष किसी उद्देश्य को सपना ने रूप में स्वीकार कर अपने जीवन में आगे बढ़ते हुए कुछ कर दिखाने का जजबा जाग्रत करने पाठकों को आह्वान है।
      उपन्यास अपने अनेक मार्मिक स्थलों और तीन-चार घटना बिंदुओं के कारण बाल-पाठकों के अंतस को छू लेने का सामर्थ्य रखता है। पांच खंडों में प्रस्तुत कथा जीवन के व्यापक रूप को चित्रित करती है। कहा जाता है कि बच्चे भगवान का रूप होते हैं। अगर उनकी लगन सच्ची हो तो कोई रोक नहीं सकता। इसका एक उदाहरण कथा-नायक नितिन है। वह संस्कारवान बालक है। उसने जीवन में कभी सच्चाई का दमान नहीं छोड़ा। ऐसे प्रेरक चरित्रों के बल पर ही बालकों को शिक्षा मिल सकती है। नैतिक मूल्यों और संस्कारों को पोषित करना अपरोक्ष रूप से बाल-साहित्य का उद्देश्य रहा है। इस बाल-उपन्यास में मितव्यायता और दूरदृष्टि के साथ नेक इरादों से सफलता का मूल मंत्र एक चरित्र के माध्यम से चरित्रार्थ होता दिखाया गया है। नेकी कर और दरिया में डाल की मनोभावना भी यहां अभिव्यंजित होती है और संधर्ष के साथ सहजता-सुगमता से कथा-नायक को सफलता के सौपानों पर निरंतर आगे बढ़ते हुए भी प्रदर्शित किया गया है।
      रेखांकित करने योग्य बात इस उपन्यास में कि मधु आचार्य लेखक के रूप में चाहते हैं कि हम व्यस्कों को चाहिए बच्चों को आज के हालातों से जितना जल्दी हो सके वाकिफ कराएं। यह दुनिया उनकी है और उनको ही संभालनी है तब देरी क्यों? अपनी भाषा और कहन में लेखक का नितिन पर भरोसा असल में इसी उद्देश्य का परिणाम है। बड़ों और बच्चों यानी यह दोनों पक्षों के लिए उतना ही समयानुकूल और अनिवार्य है कि उन्हें जिम्मेदार औरस समझदार समझा जाए। बच्चे को बच्चा समझ कर जीवन-संघर्षों से दूर रखने के पक्ष में लेखक नहीं है। यह युगानुरूप बदलाव उतना ही जरूरी है जितना जीवन के लिए हवा-पानी।
      आर्थिक समस्याओं से ग्रसित आज हमारे समाज में जहां सुख का बस नाम के बचे हैं, वहीं मीडिया द्वारा सुनहले सपनों के बीच एक नए ही संसार को विभिन्न रूपों में परोसा जा रहा है। चुनौति यह भी है कि यांत्रिक होते मानव-समाज के बीच बाल साहित्य के रचनाकारों को सुकोमल बचपन को बचना है। आज जब साहित्य से समाज दूर होता प्रतीत होता है, ऐसे समय में मधु आचार्य जैसे लेखकों के बाल साहित्य-लेखन और इस प्रकार के कथा-साहित्य की सार्थकता बढ़ जाती है। संभवतः ऐसे ही हमारे अनेक प्रयासों से बच्चों में शब्दों के प्रति आकर्षण बचाया जा सकेगा।
      बाल-पाठकों के लिए अपना होता सपनाका पाठ आकर्षण लिए हुए है, यह अपनी भाषा, संवादों और शिल्प के कारण बाल उपन्यास-यात्रा में स्मरणीय रहेगा। पुस्तक के भीतर कथा से संबंधित चित्र प्रभावी व आकर्षक है साथ ही सुंदर मुद्रण-प्रस्तुतिकरण के लिए सूर्य प्रकाशन मन्दिर को धन्यवाद किंतु कहना होगा कि कीमत बाल साहित्य के प्रचार-प्रसार को देखते हुए कम रखी जानी चाहिए। पुस्तक के भीतर कीमत 200/- तथा आवरण पर 150/- मुद्रित है।

-नीरज दइया
 
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अपना होता सपना (बाल उपन्यास) मधु आचार्य ‘आशावादी’
प्रकाशक- सूर्य प्रकाशन मन्दिर, बीकानेर ; संस्करण- 2016; पृष्ठ- 64 ; मूल्य- 150/-
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