महत्त्वपूर्ण है प्रेम के विविध रूपों से रू-ब-रू होना / नीरज दइया

मधु आचार्य ‘आशावादी; के ‘अनछुआ अहसास और अन्य कहानियां’ संग्रह में सात प्रेम कहानियां संग्रहित है। इन कहानियों की पृष्ठभूमि प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष किसी सत्य पर आधारित प्रतीत होती है। कहानी सत्य पर ही आधारित हो, ऐसा अनिवार्य नहीं हुआ करता किंतु इन कहानियां में जो अभिव्यक्त है, उससे भी कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण है जो अभिव्यक्त नहीं है किंतु उसे प्रस्तुत करने का यहां प्रयास किया गया है। यहां यह सर्वाधिक आकर्षित करने वाला तथ्य है कि इन कहानियों में युवा प्रेम का आवेग उफान पर चित्रित और चिह्नित किया गया है। इस युवा-आवेग को बिना जाने-समझे इन कहानियों की पूर्णता को प्राप्त नहीं किया जा सकता। इन कहानियों के पाठ में प्रेम की अनेक घटनाएं नाटकीय और कपोल-कल्पना अथवा बिलकुल असत्य जैसी प्रतीत हो सकती है, किंतु मेरा मानना है कि इनके पाठ के बाद तत्काल ऐसा कहना थोड़ी जल्दबादी होगी। यदि आप किशोरावस्था और किशोर-मनोविज्ञान के अध्येता रहे हैं तो आपको वही स्थितियां सहज और स्वाभाविक लगेंगी जो बहुत सरसरी निगाह में मिथ्या प्रतीत होती हैं। मधु आचार्य की कहानियां अपनी पठनीयता एवं संवेदनशीलता के बल पर पाठकों को बांधे रखने में सक्षम हैं। मॉरीशस के साहित्यकार राज हीरामन के अनुसार- ‘पारिवारिक और सामाजिक सीमाओं को लांघतीरूढ़ीवाद की दहलीज के अंदर दम तोड़ती और संघर्ष करती सातों कहानियां प्यार से लबालब है। न कहीं कमन कहीं ज्यादा!
      विभेद की दृष्टि से प्रेम के सफल अथवा असफल होने का विभाजन किया जा सकता है, और राज हीराम ने पुस्तक का फ्लैप लिखते हुए ऐसा किया भी है, किंतु इस विभाजन से भी कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण है मधु आचार्य द्वारा आधुनिक संदर्भों में इक्कीसवी सदी की युवा पीढ़ी के प्रेम का बदलता रंग-रूप चिह्नित कर रेखांकित करना। यहां पाठ की कुछ सहमतियां और असहमतियां प्रेमचंद द्वारा रचित निबंध ‘साहित्य का उद्देश्य’ की इन पंक्तियों के माध्यम से देखी-समझी जानी चाहिए। बकौल प्रेमचंद- ‘साहित्य केवल मन-बहलाव की चीज नहीं है, मनोरंजन के सिवा उसका और भी कुछ उद्देश्य है। अब वह केवल नायक-नायिका के संयोग-वियोग की कहानी नहीं सुनाता, किंतु जीवन की समस्याओं पर भी विचार करता है, और उन्हें हल करता है।’ मेरा मानना है कि आज हमारी सबसे बड़ी समस्या हमारे प्रेम से जुड़ी है अथवा प्रेम ही उन सभी समस्याओं का उत्स है।
      तकनीकी क्रांति और बदलते सामाजिक परिवेश में जीवन-मूल्य ढहते जा रहे हैं। इन सब के बीच बाह्य और आंतरिक संघर्ष का संताप हम ढो रहे हैं। ऐसे में अपनी इन कहानियों में अनेक स्थलों पर कहानीकार ने हमारे आस-पास के घटनाक्रम द्वारा हर पीढ़ी को आगाह करते हुए जैसे कुछ कहने का आगाज किया है। यह कहना किसी उपदेश अथवा संदेश की मुद्रा में नहीं वरन कहानी के स्वर में ऐसा गुंथा है कि वह हमें पाठ में स्वयं प्राप्त होता है। उदाहरण के लिए संग्रह की कहानी ‘धुंधला-धुंधला आकाश’ नायिका पूजा की प्रेम कहानी है, जो असल में तीन पीढ़ियों के बीच बदलते संबंधों की कहानी है। इस में बीच की पीढ़ी का दायित्व-बोध कहानी में मुखरित है, किंतु साथ ही यह संदेह भी यहां अभिव्यंजित होता है कि क्या ऐसा होना चाहिए।
      कहानी ‘लड़कपन’ की नायिका सीमा आत्म-हत्या कर लेती है, और इसे अमर-प्रेम की संज्ञा देती है। यहां यह संदेस है कि यह अमर-प्रेम नहीं वरन एक आवेग है। अब भी हमारे समाज में रूढ़िग्रस्त मानसिकता और विभिन्न विभेदों की दीवारें प्रेम को रोकती-टोकती है। प्रेम की जटिलता और द्वंद्व का चित्रण कहानी में देखा जा सकता है।
      कहानी ‘खेजड़ी की साख’ की नायिका लक्ष्मी का प्रेम उसके वर्तमान को धवस्त कर देता है और वह प्रेम की असफल से मनोरोगी होकर जीवन जीने को मजबूर होती है। यहां ठाकुर और किसान में वर्गों का विभेद और संबंधों को एक उदाहरण के रूप में समझा और देखा जाना चाहिए। कहानीकार प्रेम को विभन्न कोणों द्वारा देखना-समझना और समझाना चाहता है।
      सुमन और अशोक की प्रेम कहानी है ‘अनछुआ अहसास’, जिसमें मनीषा के माध्यम से प्रेम-विवाह का एक सत्य अथवा संदेह प्रकट होता है। कोई भी घटना किसी वर्तमान के समक्ष प्रमाण हुआ करती किंतु ऐसा ही होगा यह संभव होने का प्रमाण नहीं होती है। प्रेम-संबंधों में हल्की-सी चूक थोड़ी-सी नादानी और नासमझी सब कुछ तबहा और बरबाद कर देती है। कहानी में परिवार का कहना मानना एक संदेश है, किंतु उससे भी बेहतर इसे कहानी में विकसती विवेक सम्पन्नता के रूप में देखा जा सकता है।
      ‘अधूरा सपना : अधूरा इजहार’ की नायिका नीलम प्यार में जान दे देती है। ऐसी घटनाएं समाज में होती है और उस क्षण विशेष की विवेकहीनता के परिणाम को कहानी अपने सुंदर संवादों, सहज भाषा और कथानक के साथ अनेक मनोभावों को प्रकट करती हुई, युवा पीढ़ी को समझने के साथ समय रहते संभाल जाने का एक जरूरी संदेश भी देती है। इसी भांति कहानी ‘अनकहा सच’ में ललिता का संकल्प है तो ‘अधूरी प्यास’ में जीवन के एकाकीपन में चीनी कम जैसा कथानक जवान और कच्ची उम्र के गलत फैसलों का विवरण भी है।
      समग्र रूप से ‘अनछुआ अहसास और अन्य कहानियां’ का पाठ प्रेम के विविध रूप से रू-ब-रू होने जैसा है। प्रेम का होना जीवन में बेहद जरूरी है। मैं यहां अपनी काव्य पंक्तियों का स्मरण करता हूं- जो है खिला हुआ/ उस के पीछे प्रेम है/ जहां नहीं है प्रेम/ वहां सुनता हूं-/ खोखली हंसी। मित्रो, इस कहानी-संग्रह को हमारी खोखली होती हुई हंसी को बचाने के रचनात्मक उपक्रम के रूप में पढ़ा जाना चाहिए।
-नीरज दइया
  
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अनछुआ अहसास और अन्य कहानियां (कहानी संग्रह) मधु आचार्य ‘आशावादी’
प्रकाशक- सूर्य प्रकाशन मन्दिर, बीकानेर ; संस्करण- 2016; पृष्ठ- 96 ; मूल्य- 200/-
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