संवेदनशीलता को हासिल करना और बचाना / नीरज दइया

आज के दौर में इन्सान संवेदना से रहित होता हुआ मशीन बन जाने के षड्यंत्र में शामिल हो चुका है। दौड़ के इस युग में हमारे पास अवकाश नहीं है। वर्तमान समाज लेखन को किसी कर्म की श्रेणी में नहीं मानता। संवेदनाओं में निरंतर आस्था को बनाए और बचाए रखना बेहद कठिन होता जा रहा है। ऐसे समय में मधु आचार्य “आशावादी” ने अपने इस उपन्यास “इन्सानों की मंडी” के माध्यम से साहित्य और लेखन से दूर होते जा रहे समाज को संवेदनाओं के बेहद करीब लाने का उपक्रम किया है।
हमारे भीतर विचारों का लंबा सिलसिला है। यह जटिल से जटिल बेहद उलझन भरी प्रक्रिया हमारे भीतर निरंतर चलती रहती है। इसमें किसी के चाहने या न चाहने का कोई विकल्प नहीं। लेखक-कवि कुछ विचारों का पीछा करते हैं। किसी विचार विशेष को समझना और कागज पर उतारना सरल नहीं है। साहित्य के क्षेत्र में इस कार्य की जटिलता कई गुना बढ़ जाती है। हर लेखक की तरह उपन्यासकार मधु आचार्य ‘आशावादी’ का भी शायद यही सपना रहा होगा कि इन्सानों के बीच संवेदनशीलता का विचार पहुंच जाए।   
      इस उपन्यास के संबंध में यदि एक पंक्ति में कहना चाहूं तो कहा जा सकता है कि मधु आचार्य “आशावादी” की उपन्यास-यात्रा का ही नहीं वरन इन वर्षों में प्रकाशित उपन्यासों में यह एक उल्लेखनीय और रेखांकित किए जाने योग्य उपन्यास है। “खारा पानी”, “हे मनु” और “मेरा शहर” के बाद अपने इस चौथे हिंदी उपन्यास में जहां उपन्यासकार की भाषा और शिल्प का सधापन देखा जा सकता है वहीं विचार का आवेग भी प्रखरता के साथ यहां उपस्थित है। राजस्थानी भाषा में भी मधु आचार्य के दो उपन्यास प्रकाशित हैं। इस उपन्यास में आशावादी ने कुछ  जरूरी सवालों और संदेहों को जाग्रत करने के उपक्रम में ऐसी कथा का स्थापत्य उपस्थित किया है कि हमारी चेतना में यह कृति एक अविस्मरणीय रचना के रूप में स्थायी रूपाकार ले लेती है।
      उपन्यास के शीर्षक में ही सवाल और संदेह समाहित हैं। “इन्सानों की मंडी” का अभिप्राय क्या है? क्यों है यह मंडी? यह मंडी किसी एक शहर विशेष की कथा कहती हुई मानचित्र के उस स्थान में भी सुलभ दिखायी देती है जहां उसका पाठक रहता है। इक्कीसवीं शताब्दी के आरंभ से ही जहां हम विश्व-ग्राम की बात कर रहे हैं, वहीं हमारी बहुत करीबी एक दुनिया में इन्सानों को मंडियों में पहुंच कर खुद को बेच देने का विकल्प स्वीकारने की दुखद स्थिति का सामना करना पड़ रहा है। उन इन्सानों की मजबूरी बिकना है।
“इन्सानों की मंडी” की कथा हमें हैरान और बेचैन करने वाली है। विकास की बात करें और आंकड़ों को दिखाने वालों के सामने यह उपन्यास उन्हें पुनर्विचार के लिए प्रेरित करने में सक्ष्म है। असल में उपन्यास के कथा नायक मुकुन्द की सह-नायक आलोक के माध्यम से यात्रा सही अर्थों में किसी किरदार अथवा कहे हमारे स्वयं को आलोकित करने की एक यात्रा है। हम इस उपन्यास से नई रौशनी में आ सकते हैं, और ऐसा भी कहा जा सकता है कि कोई किसी की दुनिया में नई रौशनी का माध्यम बना सकता है। एक रचना की सार्थकता इसमें ही होती है कि हम में बदलाव लाए। पूरा यह उपन्यास इस मायने में सार्थक है। इसका पाठ और पाठ का विस्तार इन्सान बनाने और बने रहने के हर संभव विकल्प का स्मरण करता चलता है।
      बेहद सरल और साधारण सी लगने वाली मजदूर-गाथा को इस रचना में उठाया गया है। यह गाथा सर्वकालिक और सर्वदेशीय है। सुबह-सुबह कुछ लोग खुद को बेचने के लिए किसी स्थान विशेष पर एकत्र होकर दुनिया की दौड़-भाग में शामिल होते हैं। बिकने वाले भी इन्सान हैं, और आश्चर्य यह कि खरीदने वाले भी इन्सान हैं। हमारे समाज में इन्सान के श्रम का यह व्यापार वर्षों से चला आ रहा है। इस पर उपन्यासकार आशावादी सवाल उठाते हैं। उम्दा बात यह है कि उनके सवाल और संदेह उपन्यास पढ़कर हमारे अपने बन जाते हैं। “इन्सानों की मंडी” उपन्यास में जहां मजदूरों की शहर में अलग-अलग मंडियां हैं, वहीं उनके अलग-अलग वर्ग भी हैं। युवा और व्यस्क मजदूर, प्रौढ़ और बूढे मजदूर, महिला मजदूरों के अतिरिक्त बाल-श्रम और भूखमरी के दिनों में कचरा बीनते या कचरे में भोजन तलाशे बच्चों की अनेक त्रासद उप-कथाएं इस उपन्यास में समाहित हैं।
      आज जब पूरी दुनिया में मशीनों का आतंक है और इन्सान भी अपनी संवेदनाओं की बलि देकर मशीनों में तब्दील होने की त्रासदी के दौर में है। ऐसी दुनिया में मशीन बनते इन्सानों का संवेदनशील इन्सान के रूप में रूपांतरण अथवा पुनर्स्थापन ही उपन्यास का मुख्य उद्देश्य प्रतीत होता है। इन्सानों के शोषण की इस कथा को प्रगतिवादी सोच की कह देने भर से समस्या का समाधान नहीं हो जाता। आंकड़ों में सच यह है कि दुनिया में गरीब कम और अमीर अधिक हो गए है। अमीर का अभिप्राय उन इन्सानों से है जिनको जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं के लिए बिकने पर मजबूर नहीं होना पड़ता। जो बिकने पर मजबूर हैं, वे खुद को गरीब मानें तो यह सच हो सकता है, किंतु हमारी दुनिया में अमीर भी खुद को गरीब मानते हैं। जिस घर में दो–चार सौ रुपये आते हैं या लाखों-हजारों रुपये आते हैं, उन सबकी मूलभूत जीवन की आवश्यकताएं समान है। सभी को भूख लगती है।
विज्ञान की इतनी प्रगति के बाद भी हर इन्सान के पेट की आग का निदान नहीं किया जा सका है। यह उपन्यास पेट की आग का एक ऐसा ही परिदृश्य हमारे सामने खोलता है, जिससे हम सभी को सबक लेना है। भूख प्रतिदिन की समस्या है और इस समस्या का हल किसी आविष्कार द्वारा होना शेष है। हम ऐसा नहीं कह सकते कि ऐसा नहीं हो सकता। कुछ भी संभव है। हर संभावना को जीवित रखा जाना चाहिए। जब इन्सान खुद अपनी संवेदनाओं और मानवीय गुणों को भूल कर मशीन बन कर अपनी दुनिया में रहने की त्रासदी भोग सकता है तो यह कौनसा मुश्किल काम है? उपन्यासकार इस औपन्यासिक कृति में कोई समाधान हमारे समक्ष प्रस्तुत नहीं करते हैं। कर भी नहीं सकते और किसी रचनाकार को ऐसा करना भी नहीं चाहिए। रचनाकार के रूप में आचार्य इस उपन्यास के माध्यम से मजदूर-महागाथा को अनेक घटकों में रचते हुए एक अंत उसी कथा-भूमि से प्रतीक रूप विकसता और चेतना के जागरण का दिखाते हैं।
भाषा और संवाद इस उपन्यास के प्राण कहे जा सकते हैं। इस उपन्यास को एक विमर्श के रूप में देखा-परखा जाना चाहिए। उपन्यास के रूप में इसके रचाव से विषय की प्रभावोत्पादकता निसंदेह बढ़ी है। उपन्यासकार हमारे मन के भीतर प्रवेश ही नहीं करता वरन कहीं चेतना के बीज भी डालता है। विमर्श स्तर पर इस उपन्यास को वैचारिक कथात्मक निबंध की संज्ञा भी दी जा सकती है। विधाओं का अतिक्रमण करता यह मुद्दा ज्वलंत और प्रासंगिक है। इस समस्या को कौन देखेगा? ऐसे लोग जो बिकने को मजबूर है, किसकी जिम्मेदारी है? घर-परिवार की जिम्मेदारी मुखिया की होती है, और यह पद खाली नहीं रहता। किसी न किसी को इस जिम्मेदारी को लेना होता है। आज सवाल और संदेह के घेरे में वे लोग हैं जो हमारे समाज-गांव-शहर और देश की जिम्मेदारी लेने का तो दावा करते हैं, किंतु वे दावे खोखले सिद्ध होते हैं। देश और समाज में ऐसी पूरी श्रृंखला है।
ऐसे कार्य को समाजसेवी संस्थाएं अपने ढंग से सीमित संसाधनों के बल पर कर भी रही हैं। हम सभ्यतर होते जा रहे हैं। ऐसी बस्तियों और लोगों के बीच यदा-कदा जाकर अपने दानी और दयावान होने का दंभ पोषित करते हैं। सच्चाई यह है कि समस्या बड़ी है। चलिए इसका समाधान तो जल्द से होता नहीं दिखता, किंतु फिलहाल इतना तो कर ही सकते हैं कि इस उपन्यास को पढ़कर ऐसे इन्सानों से किए जाने वाले हमारे व्यवहार को संतुलित करने की जिम्मेदारी समझें। हम इन्सानों के श्रमजीवी होने का सम्मान करें। श्रम की महत्ता को उजागर करता यह उपन्यास मजदूर ही नहीं वरन व्यापक रूप में इन्सानों के प्रति हमारे व्यवहार को संतुलित करने हेतु सजग भी करता है।
उपन्यास का सह-नायक आलोक सूत्रधार के रूप में बिना उपदेशक का रूप धारण किए पाठकों को आलोकित करता हुआ, जैसे जीवन के मर्म को समझने की दिशा में अग्रसर करता है। उपन्यास की कथा ग्यारह भागों में रची गई है और प्रत्येक भाग के लिए पृथक शीर्षक उपन्यासकार ने दिया है। उपन्यासकार की खूबी है कि वह अपने पात्रों को जहां कथा-विकास के मार्ग पर रेखांकित करता चलता है, वहीं पाठकों को भी किसी नाटक के दर्शक के रूप में घटनाक्रम से इस प्रकार जोड़े रखता है कि वह धीर-गंभीर कथा में उतरता चलता है। मेरा मनना है कि उपन्यास-सृजन के लिए किसी भी लेखक का संवेदनशील और चिंतनशील होना आवश्यक है और मधु आचार्य “आशावादी” ने संवेदनाओं को जाग्रत करने वाले इस उपन्यास को बहुत विचार-मंथन के बाद ही शब्दों में उतारा है। कला हमें संस्कारित करती है, वह हमारे भीतर परिवर्तन लाती है। साहित्य के रूप में इस उपन्यास के माध्यम से हमारा यह संस्कारित-परिवर्तित और परिवर्द्धित होना यहां संभव होता देख सकते हैं।
-नीरज दइया

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इन्सानों की मंडी (उपन्यास) मधु आचार्य ‘आशावादी’
 प्रकाशक- सूर्य प्रकाशन मन्दिर, बीकानेर ; संस्करण- 2014; पृष्ठ- 128 ; मूल्य- 200/-
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