‘होने से न होने तक’ में स्त्री-मन

   कवयित्री रजनी छाबड़ा के कविता संग्रह ‘होने से न होने तक’ में एक ऐसा स्त्री-मन उपस्थित है जिसमें वह किसी अति-आत्मीय स्वजन की अनुपस्थिति का जैसे गीत गा रही हैं। इस गीत का आरंभ उसके होने से था, किंतु उसका न होना भी अब होने जैसे सघन अहसास में सदा उपस्थित है। अस्तु इन कविताओं में किसी का ‘न होना’ सर्वकालिक ‘होने’ की शक्ल में दिखाई देता है। जैसे प्रतिपल निकट और निकट न होना भी उपस्थिति के रूप में संजो कर रख लिया गया है। इसे ऐसे भी कहा जा सकता है कि उसके न होने को होने की शक्ल में रूपांतरित कर लिया गया है। कहना ना होगा कि ये कविताएं स्मृतियों का एक ऐसा वितान हैं, जिसमें रजनी छाबड़ा का कवि-मन अपनी व्याकुलता में निरंतर अनंत यात्रा करता हुआ उस उनुपस्थित को न पाने की विवशता में बेचैन है।
   अपने संपूर्ण परिवेश और नितांत वैयक्तिक संसार में खोयी हुई कवयित्री अपने स्त्री-मन की विभिन्न अनुभूतियों और विचारों में किसी चिंता और चिंतन के भावों में बारंबार गहरे उतर जाने के सतत प्रयास में जैसे खोई हुई है। उसका यह खोना दरअसल जीवन को निर्बाध गति से जीने का संदेश पाना अथवा संदेश देना है।
   बिना किसी वैचारिक बोझिला के अपने स्वर को शांत, धीमा और मधुरता में साधने का यह उपक्रम कविताओं में प्रस्तुत सरल-सहज उद्धाटित आडंबरहीन स्त्री-मन की सच्चाइयों को मुखर बनाता है, जो निसंदेह हमारा ध्यानाकर्षित करता है। स्त्री-मन का सूनापन इन कविताओं में अनुभूति के स्तर पर विकसित हुआ है, जो प्रभावित करता है। वहीं संग्रह की कुछ कविताओं में व्यंजित विचार-पक्ष में एक शिक्षिका जैसा चेहरा भी झांकता है। रजनी की काव्य-भाषा में जहां उर्दू-भाषा का मिठास इन कविताओं को नज़्म की श्रेणी तक ले जाता है, वहीं इनकी सादगी-सरलता से अभिव्यंजना मर्मस्पर्शी है।
   रजनी छाबड़ा की कविताएं समकालीन हिंदी कविता में स्त्री द्वारा लिखी जा रही स्त्री-मन की कविताओं में अपनी अलग पहचान और स्थान बनाएं, इसी विश्वास के साथ इन कविताओं का स्वागत करता हूं।

– डॉ. नीरज दइया

(फ्लैप-2 पर प्रकाशित टिप्पणी)

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