विभिन्न रंगों एवं विचारों का समुच्चय / नीरज दइया

गणेश एवं सरस्वती-वंदना से आरंभ हुए कविता संग्रह ‘सद्योजात’ में कवयित्री डॉ. साधना प्रधान की जीवन को देखने-परखने की अपनी दृष्टि है, जिसे वे विभिन्न काव्य-कौशलों द्वारा कविता के रूप में प्रस्तुत करती हैं। कविताओं से पूर्व अनेक कवियों-लेखकों ने कवयित्री की सृजनशीलता पर आत्मीय टिप्पणियां लिखी हैं साथ ही स्वकथन में उनका आभार भी प्रदर्शित किया गया है। कविता रचना निसंदेह वैयक्तिक उपक्रम है, किंतु इसे परंपरा में देखा-समझा जाना भी अपेक्षित है। किसी रचना को उसकी परंपरा में देखने की अनिवार्यता से आलोचना बच नहीं सकती। कहना ना होगा कि इन कविताओं में कविता-रचना को लेकर आरंभिक किस्म का उत्साह यत्र-तत्र देखा जा सकता है, जिसके रहते कविताओं के चयन में निर्ममता नजर नहीं आती। कविता लेखन किसी सूत्र को पा जाना नहीं वरन आत्माभिव्यक्ति को चयनित शब्दों में काव्यात्मक रूप के निर्वाहन के साथ प्रस्तुत करना होता है। यहां किसी विचार के कविता बनने और बनते बनते रह जाने की त्रासदी के साथ हमें गद्य और पद्य के तात्विक अंतर पर भी किंचित विमर्श करना होगा।
    सद्योजाता का अभिप्राय है जो अभी या कुछ ही समय पहले उत्पन्न हुआ हो। निसंदेह यह कवयित्री का प्रथम प्रयास है और उनके जीवन के विभिन्न रंगों एवं विचारों का समुच्चय भी नजर आता है किंतु यहां भावाभिव्यंजना में स्वयं की निजता के रंग बेहद कम है। किसे क्या खूब कहा कि पंखों से कुछ नहीं होता, हौसलों से उड़ान होती हैं। मंजिल उन्हीं को मिलती हैं, जिनके सपनों में जान होती है। इसी भावभूमि को कवयित्री ने अपनी कविता ‘हुनर’ में प्रस्तुत किया है-
मंजिलें... कभी भी, / पैरों या पंखों के आकार से, / नहीं मिलती / मिलती है,
हुनर पर, किए गए / विश्वास से!  (पृष्ठ- 29)
यहां हौसले का हुनर में रूपांतरण किया गया है। कवयित्री ने बेहद सहजता और सरलता से इस कविता का आरंभ किया है-
असंभव !  / कुछ भी नहीं /
इस जहां में, / जब एक नन्हा परिंदा भी /
नाप लेता है, / समंदर के विस्तार को! (पृष्ठ- 29)       
    यह जीवन की विशिष्टता है कि इसमें सुख-दुख और धूप-छांव का खेल चलता रहता है। साथ ही जीवन के समानांतर अनेकानेक जीवन और घटनाक्रम होते हैं। ऐसे में हमारे जीवन के लिए हमें आस-पास के जीवन से प्रेरणा मिलना मुश्किल नहीं। आज की कविता का सच कहीं से आयातित नहीं वरन हमारे जीवन के इर्द-गिर्द ही हम देख सकते हैं। संभव-असंभव और विश्वास की किसी भी कविता में उसके प्रारूप, विराम एवं विराम-चिह्नों का भी भावाभिव्यक्ति में अपना योगदान होता है। यह यह भी उल्लेखनीय है कि कविता संग्रह के माध्यम से कोई कविता केवल और केवल अपने पाठ द्वारा पाठक तक संप्रेषित होती है, जहां उसके रचनाकार का नाद अनुपस्थित होता है। ऐसे में हर पाठ उस नाद के समानांतर किसी दूसरे नाद में ही होता है। कवयित्री ने कविताओं से पूर्व स्वकथ्य में लिखा है- “संग्रह में मैंने अपनी 101 कविताओं को समावेशित किया है, जो जीवन के विभिन्न पहलुओं, समसामयिक घटनाओं, सूक्ष्म मनोभावों, विविध जीवन मूल्यों एवं प्रेम के संयोग और वियोग दोनों ही पक्षों से सम्बंद्ध हैं। कहीं कहीं तो जीवन के अतिसाधारण लगने वाले विषयों पर भी मैंने कविता-सृजन का दुस्साहस किया है।”
    आज के दौर में रचना स्वयं अपने आप में दुस्साहस है। इस दुस्साहस का ही परिणाम है कि कवयित्री ‘उड़ान’ शीर्षक की कविता में छोटी-सी बहर को साधते हुए बहुत कुछ कहती हुई नए नाद में अर्थ का नया वितान रचती प्रतीत होती हैं।
छोटा-सा है जीवन / कामनाएं अपार। /
सतरंगी सपने लिए / सैकड़ों-हजार। /
मन का चपल पखेरू / उड़ने को तैयार। /
रोक कहां पाऊं / मैं उसकी उड़ान। /
जाना है उसको / बादलों के पार। /
पाना है उसको / एक नया संसार।  (पष्ठ- 51)   
    जहां कोई प्रयास नहीं वहां कविता संभव होती दिखाई देती है और जहां विचार किसी ज्ञान अथवा विकेक के रहते कविता में आता है वहां नया संसार पाना संभव होते होते रह जाता है। इसे कविता ‘सच्चा मीत’ की इन काव्य-पंक्ति द्वारा समझा जा सकता है-
सुख में साथी सब बन जाते, / दुख में सभी कतराते हैं। /
यह संसार स्वार्थ का मेला / मीत कहां मिल पाते हैं॥ /
‘मित्र’ वही खरे होते, जो / ‘विपदा’ में साथ निभाते हैं। (पृष्ठ- 55)
    एक अन्य उदाहरण ‘वायदा’ से देखें-
यदि तुम ! / मेरे अंसुवन की भाषा पढ़ सके /
वेदनाओं के अर्थ गढ़ सके / मेरे मौन को शब्दों में मंड सके /
मैं ! सचमुच ; / तुम्हें ‘मननीत’ बना लूंगी /
प्रीत के गीत तेरे संग गा लूंगी / तुम्हें जीवन-संगीत बना लूंगी। (पृष्ठ- 79)
    ऐसे ही अनेक मनोभावों में ‘सद्योजात’ की कविताएं स्वयं इसके शीर्षक को सार्थक करती हैं। मध्यकाल में मीरा ने प्रीत के विषय में कहा नगर ढिंढोरा पीटती कि प्रीत न करियों कोय, उसी परंपरा में कवयित्री का परामर्श ‘प्रीत की रीत’ कविता के आरंभ में इस पंक्ति द्वारा प्रकट हुआ है-
सुन सखी ! / मुझको प्रीत न करनी /  प्रीत बड़ी दुखदाई। /
इस पथ में / जो भी आया / उसने ठोकर खाई। /
बड़ी विकत है, / रीत-प्रीत की / मंजिल किसने पाई? (पृष्ठ- 89)
    अंत में कवयित्री को मंगलकामनाएं उन्हीं की ‘पथिक’ कविता की काव्य-पंक्तियों द्वारा-
सुन पथिक ! / राह में रूकना मत / चलते जाना ! / चलते जाना !  /
आएंगी बाधाएं / बहुत मगर / चलते जाना ! / चलते जाना ! (पष्ठ- 122) 
    कवयित्री की सर्वाधिक सफलता सहज, सरल एवं सुंदर भाषा में अभिव्यक्ति की तलाश है। आशा है कि सद्योजात की कवयित्री निसंदेह अपने आगामी कविता-संग्रह में चयनित दृष्टिकोण और विवेकपूर्ण  चयन के साथ रहते निश्चय ही स्त्री मन को अभिव्यक्ति प्रदान करेंगी। सुंदर सुरुचिपूर्ण मुद्रण के लिए कलासन प्रकाशन के प्रकाशक बधाई के पात्र हैं।
- डॉ. नीरज दइया
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  • पुस्तक- काव्य संग्रह : सद्योजात / कवयित्री- डॉ. साधना प्रधान / प्रकाशक- कलासन प्रकाशन, बीकानेर (राज.) / पृष्ठ- 156 / मूल्य- 200/-
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