सीख देती बाल कथाएं / नीरज दइया

    ‘कर भला तो हो भला, अंत भले का भला’ जैसी अनेक उक्तियों में जीवन का मर्म है और इसे बच्चों तक पहुंचनाने में मदद करती है बाल कहानियां। ऐसी ही 13 बाल कहानियों का संग्रह है- अंत भले का भला। अब सवाल यह भी है कि क्या हम बच्चों के केवल और केवल पाठ ही पढ़ाना चाहते हैं। इसका जबाब है नहीं, हम बाल कहानियों के माध्यम से उनका मनोरंजन करना चाहते हैं और ऐसे में अगर मनोरंजक कहानियां पाठ भी पढ़ाएं तो बुराई कहां है। बाल कथाकार कुसुम अग्रवाल के इस संग्रह में ऐसी अनेक कहानियां गहरी सूझ-बूझ और बाल मनोविज्ञान को ध्यान में रखते हुए रची गई है।
    शीर्षक कहानी ‘अंत भले का भला’ में विजय को स्कूल जाते हुए रास्ते में एक आदमी बेहोश पड़ा मिलता है, वह उसकी मदद करता है। विजय स्कूल जल्दी पहुंचने की फिराक में था क्यों कि उसे देर हो चुकी थी। स्कूल में होने वाली चित्रकला प्रतियोगिता में वह भाग लेना चाहता था किंतु होने को कुछ दूसरा ही मंजूर था। उसे लगा इस बेहोश आदमी की मदद जरूरी है। पर यह क्या, मदद करना उसे भारी पड़ा। होश में आने पर सेठ जीवनराम ने उसी पर चोरी का आरोप लगाया। कहानी में लगाता है कि ऐसी भलाई करना बहुत महंगा पड़ता है। कहानी को इस तरह रचा गया है कि सांसे थम-सी जाती है। इसी बीच कहानी करवट लेती है और असली अपराधी को उसकी मां सामने लाती है। जाहिर है अंत में जीवनराम विजय को सीने से लगा लेता है। उस गरीब बच्चे की पढ़ाई-लिखाई का खर्चा स्कूल की तरफ से होना घोषित होता है। कहानी की अंतिम पंक्ति है- विजय ने सिर उठाकर देखा तो स्कूल की दीवार पर लिखा था ‘कर भला तो हो भला, अंत भले का भला है।’ (पृष्ठ-40) यह पंक्ति पहले भी लिखी हुई थी किंतु जिन परिस्थितों को पार करा कहानी में विजय को कहानीकार दिखा रहा है और उसके माध्यम से पाठकों को दिखा रहा है यह महत्त्वपूर्ण है।
    सरलता, सहजता और प्रवाहयुक्त भाषा में यह और संग्रह की अनेक कहनियां अपने उद्देश्य में सफल होती हैं। कहानी में एक अनुभव को बहुत कलात्मक ढंग से संप्रेषित किया गया है। किंतु फिर भी लेखिका को संग्रह के आरंभ में पांच पृष्ठ के समर्पण-आलेख में यह लिखने की आवश्यकता समझ से परे है- “कहानी ‘अंत भले का भला’ जिसके नाम पर मैंने इस पुस्तक का नामकरण किया है, यह कहती है कि भलाई का अंत सदा अच्छा ही होता है, सुखद ही होता है। भले ही प्रत्यक्ष रूप में हमें यह नजर ना आएं परंतु अंत में भले का फल भला ही होता है। अंत कभी-कभी परिस्थितिवश हमें निजी स्वार्थ को भूलकर परहित को प्राथमिकता देनी चाहिए।” (पृष्ठ-6) संभवतः यह लेखिका का अपने शब्दों पर अविश्वास है। उन्हें विश्वास रखना चाहिए कि यह जो बात वे समझा रही है वह तो कहानी खुद ही समझा रही है। ऐसी भूमिकाओं अथवा स्पष्टीकरणों से बचा जाना चाहिए। सभी कहानियों के बारे में लेखिका ने आरंभ में ही सब कुछ बता दिया है इससे जो मर्म कहानी से स्वतः प्रकट होना है वह एक दिशा में बंध-सा जाता है।
    संग्रह की पहली कहानी ‘जिद की हार’ बेहद मार्मिक है, इसमें दो दोस्तों महेश और विनोद को यादगार पात्रों के रूप में चित्रित किया गया है। जिद नहीं करनी चाहिए और जिद से क्या हो सकता है इसे बहुत सुंदर ढंग से कहानी में नियोजित किया गया है। इसी भांति ‘मेरी सखी’ कहानी में दो लड़कियां रीता और नीतू के माध्यम से दोस्ती का ऐसा रहस्य लेखिका ने सहजता से उजागर किया है कि इस बारे में किसी भूमिका में कहना कहानी को कमजोर करना है। छोटी-छोटी इन मार्मिक कहानियों को औसतन तीन पृष्ठों में साथ में दो पृष्ठों में चित्र देकर कलात्मक ढंग से पांच पृष्ठों में संजोया गया है। कहानियों में बच्चों की निडरता, बहादुरी, परिस्थितियों से समझ-निर्माण, अंतर्दृष्टि, सद्भावना, सत्यनिष्ठा जैसी अनेक भवनाओं पर प्रकाश डाला गया है।
    कहानी ‘अनोखा जादू’ संग्रह की सर्वश्रेष्ठ कहानी है जिसमें एक दोस्त के द्वारा दूसरे दोस्त की चोरी करने की आदत को बहुत शानदार ढंग से सुधारने का सबल प्रयास प्रस्तुत किया गया है। दोस्त के लिए उसकी भावनाओं को ठेस पहुंचाए बिना उसे बदलने का मार्ग देना कहानी की बहुत बड़ी बात है जो सरलता-सहजता से उजागर होती है। वहीं कहानी ‘कैसी दोस्ती’ भी दो दोस्तों की कहानी है मगर इसमें अपने नकलची दोस्त के बारे में आशू का परीक्षा परिणाम के बाद में शिक्षक को बताना और शिक्षक का नीरज के अंक काट लेना विश्वनीय नहीं है। कहानी की पंक्ति देखें- ‘सारी बात सुनकर अध्यापक ने नीरज की ओर देखा। वह सिर झुकाए खड़ा था, अध्यापक ने नीरज के सभी अंक काट लिए तथा उसे फेल घोषित कर दिया।’ (पृष्ठ-79) सवाल यह है कि यह कौनसा स्कूल रहा होगा जिसमें 100 अंक देकर अध्यापक बच्चे को फेल करने का अधिकार रखता है। जैसे दूध में जरा-सा जावण (दही) देते ही एक दूसरी प्रक्रिया आरंभ हो जाती है ठीक वैसे ही इस पूरे संग्रह के अंत में ऐसी असावधानी उस भले को बुरा करने के लिए पर्याप्त है। समग्र रूप से कहना होगा कि कुसुम अग्रवाल की कहानियां पाठकों को लंबे समय तक प्रभावित करती रहेंगी। वे बच्चों के जीवन के बहुत छोटे-छोटे प्रसंगों से मार्मिक कहानियां निर्मित कर देने में प्रवीण हैं।      
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समीक्षक : डॉ. नीरज दइया 
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पुस्तक : अंत भले का भला (बाल कथा-संग्रह) ; कहानीकार : कुसुम अग्रवाल ;  प्रकाशक  : साहित्यगार, धामाणी मार्केट की गली, चौड़ा रास्ता, जयपुर ; संस्करण : 2018 ; पृष्ठ : 80 ; मूल्य : 150/- 
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