फिर से बच्चों की भूतों से मुठभेड

लेखन में डॉ. फकीर चंद शुक्ला एक जाना-पहचाना नाम है। नए बाल उपन्यास ‘साहसी बच्चे’ में आपका लेखक-परिचय पुस्तक के अंतिम आवरण के साथ ही भीतर तीन पृष्ठों में देखा जा सकता है। डॉ. शुक्ला ने पुस्तक के आरंभ में ‘चिंतन मनन’ के अंतर्गत बाल साहित्य के संबंध में अपनी अवधारणाओं पर दो पृष्ठों में प्रकाश डाला है। इस किशोरोपयोगी उपन्यास में अवधारणाएं और परिचय प्रभावित करने वाला है। लेखक की लंबी और सतत साहित्य-साधना का सम्मान करते हुए यहां कहना है कि भूमिका में वर्णित अवधारणाओं का प्रतिफलन पुस्तक में नहीं हुआ है। भूमिका के अनुसार- ‘हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि आजकल के बच्चों का बौद्धिक अंश जब हम बच्चे होते थे की तुलना में कहीं अधिक है क्योंकि उनके लिए ज्ञान प्राप्ति के अनगिनत साधन उपलब्ध है। इसलिए उनमें कुछ नवीन जानने की जिज्ञासा बनी रहती है।’ प्रस्तुत उपन्यास ‘सहासी बच्चे’ में भूत-विषयक पुराने अंधविश्वास को दिखाना और फिर से बच्चों की भूतों से मुठभेड़ करना नवीन नहीं कहा जा सकता है।
    उपन्यास की कथा दो दोस्तों मोहन और सुरेन्द्र की मजाक-मस्ती और चुहलबाजी प्रस्तुत करते हुए शहर से गांव का रुख करती है। दोनों पात्रों के नाटकीय संवाद और लेखकीय कौशल से उपन्यास के आरंभ में कौतूहल का भाव विकसित होता है। जब मामाजी के माध्यम से वे ननिहाल पहुंचते है और कहानी भूतों की दिशा का रुख करती है तो रहस्य पहले से ही चौपट हो जाता है।
    लेखक का मानना सर्वथा उचित है कि ‘बच्चों के मनोविज्ञान को समझते हुए, उनकी आधुनिक आवश्यक्ताओं तथा रुचि के अनुसार ही साहित्य लिखना चाहिए’ साथ ही इससे भी सहमत हुआ जा सकता है कि किशोरावस्था जिंदगी की वह संवेदनशील अवस्था है, जहां भविष्य की नींव रखी जाती है। प्रस्तुत उपन्यास में उन्होंने किशोरों के जीवन में होने वाली सामान्य घटनाओं को आधार बनाकर यह रचना की है। लेखक को विश्वास है कि यह उपन्यास किशोरों को पसंद आएगा और प्रेरणाप्रद सिद्ध होगा। यहां यह विचारणीय है कि ‘सहासी बच्चे’ उपन्यास के माध्यम से वे इस आधुनिक समय में किस प्रकार के भविष्य की नींव रखते हुए प्रेरणा दे रहे हैं। भूतों की पोल खोलने वाली ऐसी अनेक कथाएं पूर्व में आ चुकी हैं।
    कथानक के स्तर पर नवीनता नहीं होने के उपरांत भी प्रस्तुतिकरण में लेखक की निजता और भाषा के पक्ष को देखा जाना उचित होगा। बाल उपन्यास के आरंभिक अंश से एक वाक्य देखें- ‘वह इतना खुश था मानो उसकी लाखों रुपए की लॉटरी निकल आई हो।' (पृष्ठ-9) और दूसरा वाक्य इसी तर्ज का देखें- ‘पत्र पाकर तो वह ऐसे खिल उठा मानो लाखों रुपए की लॉटरी निकल आई हो।’ (पृष्ठ-39) यहा यदि हम बाल मनोविज्ञान की बात करें तो किसी मोहन के जीवन में लेखक का यह लॉटरी निकालने का सुख आधुनिक अभिव्यक्ति और किशोरीय जीवनानुभूति के अनुकूल नहीं है। मुहावरों का प्रयोग भाषा में निश्चय ही ज्ञानवर्धक होता है। यह लेखकीय कौशल होता है कि किसी मुहावरे को कहां और कैसे प्रयुक्त किया जाए। भाषा में नवीनता और विषय बोध की अनुकूलता के साथ बाल मन के बिम्बों से उनका साम्य भी देखा जाना चाहिए। वैसे भी वर्तमान संदर्भों में लॉटरी जीवन में कितना क्या महत्त्व रखती है!
    कहा जाता है कि किसी रचना में सहजता और सरलता के बीच लेखक की अवधारणा का प्रत्यक्ष आरोपण नहीं होना चाहिए। इस उपन्यास को एक रचना के रूप में लिखते हुए लेखक डॉ. फकीर चंद शुक्ला ने जब कथा का सुंदर विन्यास चुना है। किशोर पात्र मोहन अपने दोस्त सुरेन्द्र के घर उससे मिलने जाता है। वहां प्रस्तुत दृश्य में सुरेन्द्र हाथ-मुँह धोने जाना चाहता है तब लेखक द्वारा उससे बच्चों की कुछ पत्रिकाएं मोहन को दिलवाने का उपक्रम एक ऐसी ही घटना है जिसे लेखकीय अवधारणाओं का आरोपण कहा जा सकता है। दूसरा उदाहरण इसी घटनाक्रम में आगे दिखाई देता है। इस वाक्य को उदाहरण स्वरूप देखें- ‘सुरेन्द्र वह पत्र लेकर यूँ ध्यान से पढ़ने लगा जैसे किसी समाचार पत्र में अपनी परीक्षा का परिणाम पढ़ रहा हो।’ यहां कथाकार आधुनिक होने के विकल्प के साथ अपने पुराने लोक में खोया हुआ प्रतीत होता है जहां परीक्षा परिणाम समाचार पत्रों में खोजा जाता है। यह एक विरोधाभास है कि आधुनिक तकनीक की पैरवी के साथ ही हम काल के अंतराल और समाजिक बदलाव को रचना में अभिव्यक्त करने से चूक जाते हैं।
    उपन्यास के पढ़ते हुए बीच में ऐसा लगता है कि मुद्रण के समय भी संभवत कहीं कुछ अंश प्रकाशित होने में आगे का पीछे और पीछे का आगे हो गया है। इससे कथा-क्रम में बीच में थोड़ा अवरोध और व्यवधान आता है। उपन्यास के आरंभिक अंश में दो दिन बाद छुट्टियों की बात वर्णित हुई है और बीच में मोहन के विगत वर्ष में ननिहाल भ्रमण के अनुभव को साझा किया गया है। एक बार ऐसा लगता है कि इतनी जल्दी वह गांव कैसे पहुंच गया। उपन्यास में यहां से कुछ आगे मामाजी का आना और उनका लाख ना-ना करने के बावजूद भी मोहन की मां यानी उनकी बहन द्वारा दो दिन के लिए रोकना मोहन को अखरता है। अखरने का कारण बस यह है कि मोहन जल्दी से जल्दी गांव पहुंच जाना चाहता है। उसका गांव और ननिहाल के प्रति आकर्षण अस्वाभाविक नहीं है किंतु उस आकर्षण के कारणों को उपन्यास में लेखक द्वारा खोला जाना था। उपन्यास आरंभ में किंचित धैर्य से आगे बढ़ता है किंतु अंत में जैसे उसे भूतों पहुंचाने की जल्दबाजी प्रतीत होती है। इस लघुउपन्यास में सर्वाधिक प्रभावित करने वाली बात यह है कि प्रकाशन में अनुकूल साज-सज्जा प्रभावी है।  
समीक्षक : डॉ. नीरज दइया, बीकानेर (राज.)

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